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उड़ो हवा में, फ़लक से मुआमला रक्खो!!!
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उड़ो हवा में, फ़लक से मुआमला रक्खो| यारो कभी-कभी ज़मीन से भी राफ़्ता रक्खो| वक़्त सबका कहा मान लेगा ख़ुद| ये बहस दोस्तों कल के लिए उठा रक्खो| न जी सकूँगा अगर ख़ुद को मैंने जान लिया| मुझे फ़रेब से बस यूँ ही मुब्तला रक्खो| मकाँ में कुछ भी नहीं सोगबार चुप के सिवा| बुरा नहीं हैं जो दरवाज़े को खुला रक्खो| करोगे क़त्ल तो मैं जी उठूँगा तुम्हीं से| मेरे लिए क़त्ल से बड़ी कोई और सज़ा रक्खो| डसेगी चोट तो किससे लिपट के रोओगे| जले मकान में परछाईयाँ सजा के रक्खो| [मेरी पसंद कि ये ग़ज़ल है जो कि मुझे धवल त्रिवेदी जी से प्राप्त हुई थी|]
ईश्वर तेरी चाह मुझे!
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मुझे कुछ नहीं चाहिए देव तेरी माया से बस! प्रेम के मोती की चाह, मुझे तेरे हृदय-सागर में डुबो लिए जाती है| इस जहाँ के लिए तो निकृष्ट हो चला हूँ, जबसे तेरा भोलापन उतर आया है मुझमें पात्र बना हूँ परिहास का, इस पर भी काया तेरी करुणा के जल में, भीग जाना चाहती है! डूब जाता हूँ संसार-सागर के अथाह जल में जब विस्मृत हो जाता है तेरा नाम जो सच है ठोकरें खाता नियति की, अपनों से ही तब आत्महत्या के बहाने, अनायास ही तेरी याद आ जाती है! जब तक जहाँ जगता है, हलचल है, मेरे हृदय में, सजग हैं इन्द्रियाँ अपने रंग में काली नागिन-सी सुप्तावस्था ले संसार, तब अकेली, बेचैन ये आत्मा, कस्तूरी की चाह में भटकती-फिरती है| यों तो चहुँ ओर, तेरी ही प्रतिमूर्तियाँ हैं स्वर्ण-कलश लिए देने तेरा प्रेम, पर न जाने क्यों? प्...
शर्मसार है लोकतंत्र, राज साहेब!
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शर्मसार है लोकतंत्र, राज साहेब! मैं आपके सामने क्या हूँ, जो आपको सलाह देने की जुर्रत कर सकूँ? पर कुछ बातें स्मृति में आती हैं| छत्रपति शिवाजी महाराज, जिन्होंने मुग़ल साम्राज्य से लोहा लिया और उसकी नाक के नीचे महाराष्ट्र की स्थापना की| आपने उनके बारे में पढ़ा ही होगा| जिस महाराष्ट्र में आप रह रहे हैं, यह उनकी ही देन है अन्यथा मराठों को अन्य शक्तियों का साथ कब मिला? उन्होंने अपनी सेना के संगठन में हरेक वर्ग का सहयोग लिया| फिर मुझे याद आता है बालासाहेब के बारे में कि उन्होंने मुंबई में उन दिनों समानांतर सरकार सफलतापूर्वक चलाई जबकि वहाँ दाउद इब्राहिम का ज़बरदस्त दखल था| तब शायद आप बालक ही हों! अब मैंने देखा है कि पिछले एक दशक में कुछ लोग बड़े हो गए और उन्होंने बालासाहेब से नाता तोड़कर अपना एक नया साम्राज्य बनाने की कोशिश की है| आप तो जानते हैं कि आपसी कलह परिवार का विनाश करती है और बाहरी ताकतों को जलसा करने का मौका देती है| आज आप देखते ही हैं कि आपका सयुंक्त परिवार सत्ता से कितनी दूर है! आपको ज़रूर मंथन करना चाहिए| यदि व्यक्ति को अपने प...