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ये हमारे हुक्मरान!

जब शक्ति प्राप्त करने की बात होती है तो लोग मूँछों पर ताव देते हुए, बल का प्रदर्शन करते हैं| दोनों हाथ जोड़कर नम्रता और विनय की मूर्ति बनते हैं| सुनहरे भविष्य के सपने दिखाते हैं| जीत के जश्न को पटाखे फोड़कर प्रकट करते हैं| कानून-नियम की तमाम बातें करते हैं| विरोधियों के काले कारनामों की सूची बनाते हैं| उनके अराजक साम्राज्य की तस्वीर बड़े करीने से गढ़ते हैं|                                         जब सत्ता के गलियारे में वे पहुँच जाते हैं तो वे तमाम उन बातों को, जो वे अब तक करते रहे; जैसा कि ऊपर वर्णन किया गया है, पूरी तरह भूल जाते हैं| वो मूँछों का ताव और वो ढोल-धमाकों के शोर में नाचना; सब स्मृति से उड़न-छू हो जाता है|                             ...

रंगमंच की दुनिया! मनमाफ़िक दुनिया!!

इस संसार में आपको ईश्वर ने जैसा बनाकर भेजा है; आप वैसी ही क़द-काठी, रंग-रूप और समाज से मिले हालातों के बंधन में जकड़े हुए जीवन जीते हैं| "नाटक" में ये बंधन नहीं होते| यहाँ आपको मनमाफ़िक दुनिया में जीने का एक मौका मिलता है|   -गणपत स्वरुप पाठक

अब्दुल कलाम के विचार!

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अभी हाल ही में, मुझे मेरे मित्र का इलेक्ट्रॉनिक-संदेश मिला जिसमें पूर्व राष्ट्रपति अब्दुल कलाम के एक लेख की प्रति थी लेख में जो कहा गया था वह हमें जगाने को पर्याप्त था हम गुलाम इसलिए बने क्योंकि हम जागरूक नहीं थे आज भी तरक्की के मामले में हम स्वावलंबी नहीं हैं हम अपने देश के नेताओं को दोष देते हैं, व्यवस्था को दोष देते हैं, परन्तु ये भूल जाते हैं कि हम में से ही नेता बनते हैं और हम ही मिलकर व्यवस्था का जाल बुनते हैं मुझे याद आता है, आमिर खान का "अहा ज़िन्दगी" में लिखा लेख उस लेख में भी हमारे उन नागरिकों के बारे में कहा गया है जो कुछ करने के बजाय केवल दूसरों पर दोषारोपण करने में माहिर हैं यहाँ देश के लिए दो महत्त्पूर्ण मुद्दे रखना चाहता हूँ- एक सांप्रदायिक झगड़े और दूसरा देश की समृद्धि!! पहले मुद्दे पर में आमिर खान से सहमत हूँ कि सांप्रदायिक झगड़े तभी बड़ा रूप लेते हैं जबकि आप उसमें हिंदू-मुसलमान वाली बात नज़र करते हैं यदि देखा जाए तो झगड़ा तो वह वैसा ही है जैसे कि दो भाई अपने अधिकारों के लिए झगड़ते हैं या दो पड़ोसी किसी घरेलू विवाद के कारण झगड़ते हैं और बाद में उनके क़रीबी रिश्तेद...

मरु-जीवन की मृग-तृष्णा!!

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मरु-जीवन की मृग-तृष्णा में, किसे स्वप्न साकार मिला? मिटटी के किस लौंदे को कब मनचाहा आकार मिला? कोई चाहक इस जग का तो कोई चाहक उस जग का; हाथ पसारे भिक्षुक जैसा यह सारा संसार मिला!!! ऊपर लिखी पंक्तियाँ संसार की वास्तविकता का बयान करतीं हैं! फ़िर भी ये जीवन है की बेरोक- टोक, अनवरत चलता रहता है इसी को जिजीविषा कह लो या मानव का अदम्य साहस कि सब-कुछ एक खेल कि तरह चलता रहता है; और हम इसके किरदार की तरह कष्टों को सहन करते हुए, अपनी भूमिका निभाते हुए जी जाहे हैं! आपका स्वरुप -गणपत स्वरुप पाठक २८ अगुस्त २००९ शुक्रवार

मेहनत !

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"हम अच्छी मेहनत करेंगे, इस विश्वास के साथ कि जो भी फसल होगी, भरपूर होगी! उसका दाना-दाना संसार की भूख मिटाने में सक्षम होगा! हम ऐश्वर्यशाली होंगे, यह एक गौण बात होगी! खास बात होगी, वह यह कि हमें खुशी मिलेगी, जिसकी कीमत लगाना इस दुनिया में मुश्किल है!" - आपका स्वरुप गनपत स्वरुप पाठक १० दिसम्बर २००८ बुधवार

धरमजी जियें हजारों साल !

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आज धरमजी का जन्मदिन है ! उन्हें बहुत -बहुत बधाई ! मुझे न केवल उनका अभिनय अच्छा लगता है, बल्कि उनका जीवन जीने का नज़रिया भी पसंद है । हेमाजी ने उन्हें पसंद किया क्योंकि वे सचमुच में अच्छे व्यक्तित्व के मालिक रहे हैं । आज के ही दिन मैंने अपनी पहली मोटर साईकिल खरीदी थी , २००० सन में ! एक बार फिर बधाई ! आपका स्वरुप गनपत स्वरुप पाठक ०८ दिसम्बर २००८

what kind of war is this!!!

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I do not know what kind of unannounced war is going on against india by pakistaani people and so called jehaadi. But it is not good for paakistaan. lekin aisaa kab tak chalegaa? jab tak hamein bharosa hai ki ye hamaaraa padosi mulk hai tabhi tak na? ishwar inhe buddhi de! -aapka swarup, ganpat swarup pathak 28 nov 2oo8, friday